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ब्रह्मांड में दसवां ग्रह पृथ्वी: डॉ. दुबे की नई पुस्तक समीक्षा

ब्रह्मांड में दसवां ग्रह पृथ्वी

Rating: ⭐⭐⭐⭐ (4.2 out of 5)

जब मैंने अपने चाय के कप को मेज पर रखा और इस किताब के पहले पन्ने को पलटा, तब मेरे दिमाग में एक अलग सी उत्सुकता थी। पंद्रह सालों से लगातार किताबें पढ़ते हुए और डिफाइड पब्लिकेशन (Deified Publication) में मुख्य संपादक के रूप में काम करते हुए मुझे ज्योतिष और वैदिक दर्शन पर कई ग्रंथ देखने को मिले हैं। लेकिन जब डॉ. वेद प्रकाश दुबे की पुस्तक ब्रह्मांड में दसवां ग्रह पृथ्वी मेरे हाथ में आई, तब मुझे अहसास हुआ कि यह किसी घिसे-पिटे नियम को दोहराने वाली रचना नहीं है। लेखक ने बहुत ही सरल और सीधे शब्दों में एक मौलिक सवाल उठाया है कि जिस धरती पर हम जन्म लेते हैं, अनाज खाते हैं और जीवन बिताते हैं, उसे ही हमारी ज्योतिषीय गणनाओं और नवग्रहों की सूची से बाहर क्यों रखा गया? यह सवाल इतना स्वाभाविक है कि इस पर ध्यान जाते ही पाठक सोच में पड़ जाता है।

किताब का मुख्य विषय पारंपरिक ज्योतिषीय मान्यताओं पर पुनर्विचार करना और पृथ्वी को दसवें ग्रह के रूप में स्थापित करना है। लेखक समझाते हैं कि प्राचीन काल में भू-केंद्रित अर्थात जियोसेंट्रिक मॉडल के कारण पृथ्वी को केवल एक अवलोकन बिंदु या वेधशाला मान लिया गया था। चूंकि मनुष्य खुद पृथ्वी पर खड़ा होकर बाकी ग्रहों को देखता था, इसलिए उसने आकाश में गति करने वाले नौ ग्रहों की गणना तो की, लेकिन जिस आधार पर वह खड़ा था उसे ही भूल गया। डॉ. वेद प्रकाश दुबे का कहना है कि जब आधुनिक ज्योतिष में यूरेनस, नेपच्यून और प्लूटो जैसे बाहरी ग्रहों को शामिल किया जा सकता है, तो फिर जीवन का पोषण करने वाली हमारी अपनी धरती को एक सक्रिय कारक क्यों नहीं माना जा सकता? यह किताब केवल एक विचार नहीं है, बल्कि इसके पीछे लेखक ने वेद, पुराण, आयुर्वेद और आधुनिक खगोल विज्ञान के कई मजबूत प्रमाण दिए हैं।

अंक ज्योतिष में शून्य का नया अर्थ

अंक ज्योतिष के क्षेत्र में लेखक ने एक बहुत ही अलग विचार पेश किया है। वे पृथ्वी को शून्य अर्थात 0 का अंक प्रदान करते हैं। आमतौर पर अंक ज्योतिष में केवल 1 से 9 तक के अंकों की गणना की जाती है और शून्य को कोई स्थान नहीं दिया जाता। लेकिन लेखक का तर्क है कि शून्य कोई खालीपन या अभाव नहीं है, बल्कि यह सभी संभावनाओं और पूर्णता का प्रतीक है। जिस तरह शून्य किसी भी संख्या के पीछे लगकर उसकी शक्ति को दस गुना बढ़ा देता है, उसी तरह पृथ्वी भी बाकी सभी ग्रहों की ऊर्जा को समेटकर मनुष्य के जीवन को आधार देती है। किताब में विस्तार से बताया गया है कि 0 और 1 का योग नेतृत्व में संतुलन लाता है, जबकि 0 और 2 का योग भावनाओं को स्थिरता प्रदान करता है।

वैदिक ग्रंथों और पौराणिक संदर्भों का साक्ष्य

शास्त्रों और प्राचीन ग्रंथों के प्रमाणों की बात करें तो किताब का सातवां अध्याय बहुत ही मूल्यवान जानकारी प्रस्तुत करता है। लेखक ने अथर्ववेद के प्रसिद्ध भूमि सूक्त का उल्लेख किया है, जिसमें कहा गया है कि माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः। इस श्लोक का अर्थ है कि भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। लेखक इस प्राचीन वैदिक चेतना को केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं रखते, बल्कि इसे आधुनिक पर्यावरण चेतना और महात्मा गांधी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत से जोड़ते हैं। इसके अलावा, विष्णु पुराण की वराह अवतार की कथा का विश्लेषण करते हुए वे बताते हैं कि कैसे भगवान विष्णु ने हिरण्याक्ष से भूदेवी की रक्षा की थी। यह पौराणिक कथा असल में हमें यह सिखाती है कि प्रकृति का संरक्षण करना मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।

आठवें अध्याय में हवन और यज्ञ से पहले किए जाने वाले भूमि पूजन के पीछे छिपा विज्ञान समझाया गया है, जो मुझे बहुत नया और विचारणीय लगा। लेखक का कहना है कि हमारी पृथ्वी एक विशाल आकाशीय ट्रांसफॉर्मर की तरह काम करती है। ब्रह्मांड से आने वाली सभी तीव्र ऊर्जाओं को पृथ्वी अपने भीतर अवशोषित करती है और उन्हें जीव-जगत के अनुकूल बनाती है। जब पंडित जी हवन कुंड स्थापित करने से पहले शांत होकर एकाग्र चित्त से पृथ्वी पूजन करते हैं, तो वे असल में अपनी आंतरिक चेतना को धरती की चुम्बकीय ऊर्जा के साथ जोड़ रहे होते हैं। यदि आधार ही शुद्ध और अनुकूल नहीं होगा, तो हवन से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा का प्रवाह सही तरीके से नहीं हो पाएगा।

ब्रह्मांड में दसवां ग्रह पृथ्वी
ब्रह्मांड में दसवां ग्रह पृथ्वी

स्वास्थ्य, मूलाधार चक्र और व्यावहारिक साधनाएँ

योग, तंत्र और स्वास्थ्य के साथ पृथ्वी के संबंध पर लिखे गए अध्याय भी बहुत व्यावहारिक हैं। नौवें और चौदहवें अध्याय में मूलाधार चक्र और पृथ्वी तत्व के तालमेल को विस्तार से समझाया गया है। हमारी रीढ़ की हड्डी के मूल में स्थित मूलाधार चक्र हमारे शरीर का मुख्य आधार है, जिसका बीज मंत्र लँ है। लेखक बताते हैं कि जब शरीर में पृथ्वी तत्व असंतुलित होता है, तो मनुष्य को हड्डियों की कमजोरी, मोटापा, चिड़चिड़ापन, भय और मानसिक अस्थिरता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसे ठीक करने के लिए किताब में पृथ्वी मुद्रा, जिसमें अनामिका उंगली को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाया जाता है, और मिट्टी स्नान या नंगे पैर घास पर चलने जैसी ग्राउंडिंग थेरेपी के लाभ बताए गए हैं।

कुंडली के बारह भावों में पृथ्वी के संभावित प्रभावों का विश्लेषण भी इस पुस्तक का एक मजबूत पहलू है। यदि पृथ्वी को लग्न अर्थात प्रथम भाव में रखा जाए, तो जातक शारीरिक रूप से मजबूत, धैर्यवान और व्यावहारिक बनता है। चौथे भाव में पृथ्वी का होना व्यक्ति को अचल संपत्ति, घर का सुख और गहरा पर्यावरण प्रेम देता है, जबकि दसवें भाव में यह करियर में स्थायी सफलता और जिम्मेदार नेतृत्व प्रदान करता है। इसके साथ ही वृषभ, कन्या और मकर जैसी पृथ्वी तत्व की राशियों में इस नए ग्रह का प्रभाव मनुष्य को जमीन से जुड़े रहने और ठोस निर्णय लेने में मदद करता है।

लेखन शैली और पुस्तक की संरचना

किताब की बनावट, भाषा और लेखन शैली की बात करें तो डॉ. वेद प्रकाश दुबे का अनुभव हर पन्ने पर साफ दिखाई देता है। उन्होंने संस्कृत के कठिन श्लोकों को बहुत ही सरल हिंदी अनुवाद के साथ पेश किया है ताकि एक आम पाठक भी इसे आसानी से समझ सके। अध्यायों का विभाजन बहुत तार्किक है, जिसमें पहले समस्या को उठाया गया है, फिर शास्त्रों और विज्ञान से उसका उत्तर दिया गया है, और अंत में व्यावहारिक उपाय बताए गए हैं। पुस्तक की गति सहज है और यह पाठक को बिना उलझाए सीधी बात समझाती है।

भावनात्मक रूप से यह पुस्तक पाठक को भीतर तक प्रभावित करती है। आज के समय में जब हम ऊंची इमारतों और कंक्रीट के जंगलों में बंद होकर प्रकृति से कटते जा रहे हैं, तब यह किताब हमें अपनी ज़मीन की याद दिलाती है। इसे पढ़ते हुए मुझे बार-बार अहसास हुआ कि हम अपनी कुंडली में दूर स्थित ग्रहों के दोष ढूंढते रहते हैं, लेकिन जिस धरती पर हम खड़े हैं उसकी उपेक्षा करते हैं। यह किताब केवल ज्योतिष का ज्ञान नहीं देती, बल्कि पाठक के मन में प्रकृति के प्रति आदर और कृतज्ञता का भाव जगाती है।

ईमानदार समीक्षा और पुस्तक की सीमाएँ

एक निष्पक्ष समीक्षक के रूप में मुझे इस पुस्तक में कुछ सीमाएं भी नज़र आईं, जिनका जिक्र करना जरूरी है। किताब में कुछ विचार और श्लोक कई अध्यायों में बार-बार दोहराए गए हैं, जैसे भूमि सूक्त के मंत्र और मूलाधार चक्र की बातें कई जगह दोबारा आती हैं। इससे कुछ जगहों पर पढ़ने की गति थोड़ी प्रभावित होती है। इसके अतिरिक्त, हालांकि लेखक ने पृथ्वी को दसवें ग्रह के रूप में स्थापित करने का दार्शनिक और सैद्धांतिक ढांचा बहुत बेहतरीन बनाया है, लेकिन कुंडली में पृथ्वी का सटीक गणितीय स्थान अर्थात उसकी अक्षांश-देशांतर के हिसाब से सटीक डिग्री निकालने की कोई स्पष्ट पंचांग तालिका नहीं दी गई है। इस वजह से एक अभ्यासी ज्योतिषी के लिए इसे तुरंत व्यावहारिक रूप से लागू करना थोड़ा कठिन हो सकता है।

किसके लिए है यह किताब और किसे छोड़ देनी चाहिए

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि Brahmaand Mein Dasvaan Grah Prithvi Book Review पढ़ने के बाद क्या आपको यह किताब खरीदनी चाहिए? यह पुस्तक उन पाठकों के लिए एक बेहतरीन चुनाव है जो ज्योतिष, योग, तंत्र और पर्यावरण दर्शन में गहराई से रुचि रखते हैं। यदि आप ज्योतिष को केवल भाग्य बताने वाले साधन के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवन शैली और चेतना के रूप में देखना चाहते हैं, तो यह किताब आपको बहुत पसंद आएगी। दूसरी ओर, यदि आप केवल पारंपरिक फलित नियमों, पुरानी भविष्यवाणियों और तयशुदा तालिकाओं पर निर्भर रहना चाहते हैं और किसी भी नए शोध को स्वीकार करने में संकोच करते हैं, तो शायद यह किताब आपको थोड़ी असहज लग सकती है।

अंतिम विचारों में मैं यही कहूंगी कि वर्ष 2026 के इस दौर में, जब जलवायु परिवर्तन और मानसिक तनाव हमारी सबसे बड़ी समस्याएं बन चुके हैं, तब यह पुस्तक बेहद सामयिक है। Dr. Ved Prakash Dubey ने ज्योतिष शास्त्र को एक नया आयाम देकर इसे अधिक प्रासंगिक और जीवन-केंद्रित बनाने का सराहनीय प्रयास किया है। यह किताब हमें सिखाती है कि सितारों की ओर देखने से पहले अपनी धरती को पहचानना कितना आवश्यक है। जो पाठक अपने जीवन में मानसिक संतुलन, स्थिरता और प्राकृतिक ऊर्जा की तलाश कर रहे हैं, उन्हें इस किताब का अध्ययन जरूर करना चाहिए।

FAQs

Brahmaand Mein Dasvaan Grah Prithvi book summary क्या है?

इस पुस्तक का मुख्य सार यह है कि पारंपरिक और आधुनिक ज्योतिष में पृथ्वी को केवल एक दर्शक या वेधशाला मानने के बजाय दसवें सक्रिय ग्रह के रूप में स्थान दिया जाना चाहिए। डॉ. वेद प्रकाश दुबे ने वैदिक सूक्तों, अंक ज्योतिष और पर्यावरण विज्ञान के तर्कों से यह सिद्ध किया है कि पृथ्वी की अपनी ऊर्जा, चुम्बकीय क्षेत्र और गुरुत्वाकर्षण बल हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सीधा प्रभावित करते हैं।

what is it about और इस किताब का मुख्य उद्देश्य क्या है?

यह किताब मुख्य रूप से इस बात की पड़ताल करती है कि पारंपरिक नवग्रह प्रणाली में पृथ्वी की उपेक्षा क्यों हुई और कैसे इसे अंक ज्योतिष में शून्य अंक देकर पुनः स्थापित किया जा सकता है। इसका उद्देश्य ज्योतिष शास्त्र को केवल आकाशीय भविष्यवाणियों तक सीमित न रखकर उसे पर्यावरण चेतना, मूलाधार चक्र, मिट्टी चिकित्सा और जीवन में स्थिरता लाने वाले व्यावहारिक उपायों से जोड़ना है।

should you read यह पुस्तक और क्या यह आपके लिए उपयोगी है?

यदि आप ज्योतिष, वैदिक दर्शन, योग, तंत्र और पर्यावरण के आपसी संबंध को एक नए नज़रिए से समझना चाहते हैं, तो आपको यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए बेहद उपयोगी है जो जीवन में मानसिक शांति, शारीरिक मजबूती और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने के सरल और असरदार तरीके खोज रहे हैं।

is it worth it और पाठक का इस किताब पर क्या reader review है?

यह पुस्तक बिल्कुल पढ़ने योग्य है क्योंकि यह ज्योतिष के क्षेत्र में एक विचारोत्तेजक और तार्किक दृष्टिकोण पेश करती है। पाठकों की राय में, यद्यपि इसमें कुछ पौराणिक तर्कों और श्लोकों का दोहराव देखने को मिलता है, फिर भी इसमें दी गई ग्राउंडिंग थेरेपी, बारह भावों में पृथ्वी के प्रभाव और अंक ज्योतिष की नई व्याख्याएं इसे एक बहुमूल्य और संग्रहणीय ग्रंथ बनाती हैं।