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कोख ने नहीं बाँटा, फिर हमने क्यों? Book Review: क्या यह किताब हर परिवार को पढ़नी चाहिए?

कोख ने नहीं बाँटा, फिर हमने क्यों?

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⭐⭐⭐⭐ (4.3 out of 5)

शुरुआत, एक सवाल जिसने मुझे भीतर तक सोचने पर मजबूर किया

पिछले पंद्रह वर्षों में मैंने समाज, रिश्तों, स्त्री अधिकारों और मानवीय मूल्यों पर लिखी बहुत सी किताबें पढ़ी हैं। कुछ किताबें आँकड़ों के सहारे बात करती हैं, कुछ भावनाओं के सहारे और कुछ केवल गुस्से के सहारे। लेकिन डॉ. वेद प्रकाश दुबे की “कोख ने नहीं बाँटा, फिर हमने क्यों?” पढ़ते समय मुझे सबसे पहले जिस बात ने प्रभावित किया, वह इसका मूल प्रश्न था। यह प्रश्न इतना सीधा है कि शायद हम रोज सुनते हैं, लेकिन इतने सीधे रूप में कभी खुद से पूछते नहीं।

अगर एक माँ की कोख अपने बच्चे को कभी लड़का या लड़की मानकर अलग नहीं करती, तो फिर जन्म के बाद यह भेदभाव कहाँ से शुरू होता है? यह सवाल पूरी किताब के हर अध्याय में अलग अलग रूप लेकर सामने आता है। मुझे अच्छा लगा कि लेखक ने केवल किसी एक घटना या एक सामाजिक समस्या तक अपने विचार सीमित नहीं रखे। उन्होंने जन्म से पहले शुरू होने वाले भेदभाव से लेकर परिवार, शिक्षा, विवाह, कार्यस्थल और समाज की सोच तक पूरे क्रम को जोड़ने की कोशिश की है।

एक संपादक होने के नाते मैं अक्सर यह देखती हूँ कि कई सामाजिक विषयों पर लिखी किताबें या तो बहुत उपदेशात्मक हो जाती हैं या केवल भावनात्मक अपील बनकर रह जाती हैं। यहाँ मुझे दोनों के बीच एक संतुलन दिखाई दिया। लेखक सवाल पूछते हैं, उदाहरण देते हैं, इतिहास का उल्लेख करते हैं और फिर पाठक को अपने निष्कर्ष तक पहुँचने का अवसर भी देते हैं।

यह किताब आखिर है किस बारे में?

“कोख ने नहीं बाँटा, फिर हमने क्यों?” केवल बेटियों के अधिकारों की बात करने वाली पुस्तक नहीं है। यह उस मानसिकता की परतें खोलने का प्रयास करती है जो वर्षों से हमारे परिवारों, परंपराओं और सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनी हुई है।

पुस्तक की शुरुआत ही इस विचार से होती है कि हर बच्चा माँ की कोख में समान होता है। वहाँ कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता, कोई आर्थिक स्थिति नहीं होती और सबसे महत्वपूर्ण, वहाँ लड़का या लड़की होने के आधार पर कोई सम्मान या अपमान नहीं होता। लेखक बताते हैं कि भेदभाव जन्म के साथ नहीं आता, उसे समाज धीरे धीरे सिखाता है।

इसके बाद पुस्तक कई चरणों में आगे बढ़ती है। एक अध्याय भ्रूण हत्या और लिंग परीक्षण की समस्या पर केंद्रित है। दूसरा अध्याय पितृसत्ता के इतिहास और उसकी मानसिक संरचना पर चर्चा करता है। आगे नामकरण, बचपन, शिक्षा, पालन पोषण, विवाह, धार्मिक परंपराएँ, सामाजिक व्यवहार, महिलाओं के संघर्ष, आधुनिक बदलाव और अंत में व्यक्तिगत जिम्मेदारी तक लेखक पाठक को क्रमबद्ध तरीके से लेकर चलते हैं।

मुझे यह संरचना अच्छी लगी क्योंकि किताब केवल समस्याएँ गिनाकर समाप्त नहीं होती। आखिरी अध्यायों में लेखक बार बार इस बात पर लौटते हैं कि परिवर्तन किसी कानून से पहले व्यक्ति के भीतर शुरू होता है। यही बात इस पुस्तक को केवल सामाजिक टिप्पणी बनने से रोकती है।

इस पुस्तक में मुझे सबसे अधिक क्या अच्छा लगा?

सबसे पहले मैं इसकी संरचना की बात करना चाहूँगी। अध्यायों के शीर्षक ही अपने आप में पाठक को आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उदाहरण के लिए पहला अध्याय, “समानता की कोख से भेदभाव तक का सफर”, केवल शीर्षक भर नहीं है। पूरा अध्याय यह समझाने की कोशिश करता है कि भेदभाव अचानक पैदा नहीं होता। वह धीरे धीरे परिवार, भाषा, परंपराओं और व्यवहार के माध्यम से बच्चों के भीतर बैठता जाता है।

एक दृश्य जिसने मुझे काफी देर तक सोचने पर मजबूर किया, वह जन्म से पहले लिंग परीक्षण और भ्रूण हत्या पर आधारित चर्चा थी। लेखक बताते हैं कि चिकित्सा विज्ञान का उद्देश्य बीमारियों की पहचान करना था, लेकिन उसी तकनीक का उपयोग बेटियों को जन्म लेने से पहले ही समाप्त करने के लिए होने लगा। आगे PCPNDT कानून का उल्लेख भी आता है, जिससे चर्चा केवल भावनात्मक नहीं रहती बल्कि सामाजिक और कानूनी संदर्भ भी जुड़ जाता है।

दूसरा प्रसंग जिसने मेरा ध्यान खींचा, वह नामकरण वाला अध्याय था। मैंने पहले भी इस विषय पर लेख पढ़े हैं, लेकिन यहाँ लेखक जिस तरह बेटों और बेटियों के नामों के पीछे छिपी मानसिकता पर बात करते हैं, वह अलग महसूस हुआ। बेटों के लिए शक्ति, नेतृत्व और गौरव से जुड़े नाम, जबकि कई जगह बेटियों के लिए “बोझ”, “दुखी”, “किस्मत” जैसे नाम रखने की परंपरा का उल्लेख केवल भाषाई चर्चा नहीं है। लेखक यह समझाने की कोशिश करते हैं कि नाम केवल पहचान नहीं बनाते, वे समाज की अपेक्षाएँ भी व्यक्त करते हैं। मुझे लगा कि यह किताब का सबसे अलग और याद रहने वाला हिस्सा है।

इसी तरह बचपन वाले अध्याय में खिलौनों, कपड़ों, खेलों और आजादी के माध्यम से होने वाले भेदभाव का विश्लेषण बहुत सहज भाषा में किया गया है। लेखक बताते हैं कि लड़कों को बाहर खेलने, गिरने, सीखने और जोखिम लेने की छूट मिलती है, जबकि लड़कियों के हिस्से अक्सर सीमाएँ, सावधानियाँ और जिम्मेदारियाँ आती हैं। यह पढ़ते समय मुझे अपने आसपास के कई परिवार याद आ गए जहाँ ऐसी बातें सामान्य मान ली जाती हैं।

पुस्तक में पितृसत्ता के इतिहास पर लिखा गया हिस्सा भी उल्लेखनीय है। लेखक इसे केवल पुरुष विरोधी विमर्श बनाकर प्रस्तुत नहीं करते। वे समझाने की कोशिश करते हैं कि यह एक सामाजिक व्यवस्था है जो पीढ़ियों से बनी और मजबूत हुई। इतिहास, धार्मिक व्याख्याओं और सामाजिक संरचनाओं का उल्लेख इस चर्चा को व्यापक बनाता है।

मुझे यह भी अच्छा लगा कि लेखक केवल अतीत पर नहीं रुकते। महिलाओं के आंदोलनों वाले अध्याय में सावित्रीबाई फुले, राजा राममोहन राय, स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी, आधुनिक अभियानों और मीटू जैसे आंदोलनों का उल्लेख करते हुए यह दिखाया गया है कि बदलाव संभव है और वह लगातार हो भी रहा है।

कोख ने नहीं बाँटा, फिर हमने क्यों?
कोख ने नहीं बाँटा, फिर हमने क्यों?

पुस्तक की भाषा और प्रस्तुति कैसी है?

डॉ. वेद प्रकाश दुबे लंबे समय तक राजभाषा हिंदी के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं और इसका प्रभाव उनकी लेखन शैली में साफ दिखाई देता है। भाषा सरल है, लेकिन बहुत साधारण नहीं। जहाँ जरूरत होती है, वहाँ तथ्य आते हैं। जहाँ भावनात्मक बात करनी होती है, वहाँ भाषा सहज हो जाती है।

मुझे यह भी अच्छा लगा कि पुस्तक बहुत कठिन अकादमिक शैली में नहीं लिखी गई। अगर कोई सामान्य पाठक सामाजिक विषयों पर पहली बार कुछ पढ़ना चाहता है, तो उसे इसे समझने में कठिनाई नहीं होगी। कई अध्यायों में छोटे छोटे उपशीर्षक दिए गए हैं जिससे पढ़ना आसान हो जाता है।

हाँ, एक बात मुझे जरूर लगी कि कुछ स्थानों पर लेखक एक ही विचार को अलग उदाहरणों के माध्यम से दोहराते हैं। उद्देश्य शायद बात को मजबूत करना रहा होगा, लेकिन संपादकीय दृष्टि से देखा जाए तो कुछ हिस्से थोड़े संक्षिप्त किए जा सकते थे। इससे पुस्तक का प्रभाव और भी तीखा हो सकता था।

इस पुस्तक का भावनात्मक पक्ष

मेरे लिए इस पुस्तक का सबसे प्रभावशाली हिस्सा आखिरी अध्यायों में आया। वहाँ लेखक समाज से पहले व्यक्ति की बात करते हैं। अध्याय “बदलाव की शुरुआत ‘मैं’ से, आप, मैं, हम सब” पढ़ते हुए मुझे लगा कि पूरी किताब इसी निष्कर्ष की ओर बढ़ रही थी।

लेखक बार बार यह नहीं कहते कि केवल सरकार बदले या केवल समाज बदले। वे पाठक से पूछते हैं कि क्या वह अपने घर में बेटा और बेटी को एक जैसी नजर से देखता है। क्या वह बेटियों के सपनों को उतनी ही गंभीरता से लेता है। क्या वह अपने व्यवहार से भेदभाव खत्म कर सकता है।

मुझे यह दृष्टिकोण इसलिए अच्छा लगा क्योंकि इससे पुस्तक केवल शिकायत नहीं बनती। यह जिम्मेदारी भी तय करती है। पढ़ते समय कई बार लगा कि लेखक किसी मंच से भाषण नहीं दे रहे, बल्कि सामने बैठकर बातचीत कर रहे हैं।

सच कहूँ तो पुस्तक का शीर्षक आखिरी अध्याय तक पहुँचते पहुँचते और अधिक अर्थपूर्ण लगने लगता है। शुरुआत में यह केवल एक अच्छा प्रश्न लगता है, लेकिन अंत तक यह आत्ममंथन का विषय बन जाता है।

यह किताब किन पाठकों के लिए है?

अगर आप सामाजिक विषयों पर पढ़ना पसंद करते हैं, शिक्षा, परिवार, लैंगिक समानता या भारतीय समाज की बदलती मानसिकता में रुचि रखते हैं, तो यह पुस्तक आपको पसंद आ सकती है। शिक्षकों, अभिभावकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, कॉलेज के विद्यार्थियों और नीति निर्माण से जुड़े लोगों के लिए भी इसमें उपयोगी सामग्री है।

यह उन लोगों के लिए भी अच्छी पुस्तक है जो मानते हैं कि लैंगिक समानता केवल कानून से नहीं आएगी, बल्कि घर के छोटे छोटे व्यवहारों से आएगी। दूसरी तरफ यदि आप केवल घटनाओं पर आधारित संस्मरण या कहानी पढ़ना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपकी पहली पसंद शायद न बने क्योंकि इसका स्वर विचारप्रधान है।

अंतिम विचार

Deified Publication में वर्षों से पुस्तकों की समीक्षा करते हुए मैंने यह महसूस किया है कि हर अच्छी किताब का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं होता। कुछ किताबें हमें अपने ही घर और अपने ही व्यवहार को नए तरीके से देखने के लिए प्रेरित करती हैं। “कोख ने नहीं बाँटा, फिर हमने क्यों?” मेरे लिए ऐसी ही पुस्तक रही।

डॉ. वेद प्रकाश दुबे ने किसी एक वर्ग को दोषी ठहराने के बजाय उस सोच पर प्रश्न उठाया है जो पीढ़ियों से सामान्य मान ली गई। भ्रूण हत्या से लेकर नामकरण, पालन पोषण, शिक्षा, विवाह, महिलाओं के संघर्ष और अंत में स्वयं से परिवर्तन शुरू करने तक पुस्तक एक स्पष्ट क्रम में आगे बढ़ती है। यही क्रम इसे पढ़ने योग्य बनाता है।

मुझे लगता है कि 2026 में भी इस पुस्तक का संदेश पूरी तरह प्रासंगिक है, क्योंकि आज भी समानता की चर्चा बहुत होती है, लेकिन व्यवहार में अंतर दिखाई देता है। यह पुस्तक किसी चमत्कार का दावा नहीं करती। यह केवल इतना कहती है कि अगर बदलाव चाहिए तो शुरुआत घर से होगी और घर में रहने वाले हर व्यक्ति से होगी।

मेरे लिए यह पुस्तक एक ईमानदार सामाजिक हस्तक्षेप है, जिसमें संवेदनशीलता भी है, तथ्य भी हैं और पाठक से संवाद करने की इच्छा भी। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।