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भारतीय बेटियां जुनून और गर्व: वो किताब जो सोचने पर मजबूर करती है

भारतीय बेटियां जुनून और गर्व

Rating: ⭐⭐⭐⭐ (4.2 out of 5)

मुझे क्रिकेट पर लिखी किताबें अक्सर मिलती रहती हैं, आंकड़ों से भरी हुई, मैच दर मैच का ब्यौरा देती हुई। लेकिन “भारतीय बेटियां जुनून और गर्व” पढ़ते हुए मुझे कुछ अलग महसूस हुआ। यह सिर्फ एक क्रिकेट किताब नहीं है, यह उन लड़कियों की कहानी है जिन्हें कभी घर से बल्ला लेकर मैदान तक निकलने पर ताने सुनने पड़ते थे और आज जो पूरी दुनिया के सामने ट्रॉफी उठा रही हैं। डॉ. वेद प्रकाश दुबे ने यह किताब सिर्फ 2025 विश्व कप की जीत का जश्न मनाने के लिए नहीं लिखी है, बल्कि उस पूरे संघर्ष को दर्ज करने के लिए लिखी है जो इस जीत तक ले गया। डेइफाइड पब्लिकेशन में एडिटर के तौर पर पंद्रह साल से ज्यादा समय किताबें पढ़ने के बाद मैं यह बेझिझक कह सकती हूं कि खेल पर लिखी ज्यादातर किताबें या तो बहुत तकनीकी हो जाती हैं या फिर बहुत ज्यादा भावुक, यहां लेखक ने दोनों के बीच का संतुलन काफी हद तक साध लिया है।

किताब असल में किस बारे में है

यह किताब भारतीय महिला क्रिकेट टीम के 2017 से 2025 तक के सफर को बताती है, जहां एक फाइनल हारने के बाद टीम टूटी नहीं, बल्कि दोबारा खड़ी हुई। शुरुआती अध्यायों में लेखक चयन, प्रशिक्षण और नेशनल कैंप की प्रक्रिया को विस्तार से समझाते हैं, और यह भी बताते हैं कि कैसे मेंटरशिप और मनोबल टीम में जगह पाने जितना ही जरूरी माना जाता रहा। इसके बाद किताब धीरे धीरे 2025 विश्व कप की तरफ बढ़ती है, जहां लगभग हर बड़ी खिलाड़ी को उसका अलग अध्याय मिलता है, उसकी निजी कहानी बताई जाती है, और आखिर में फाइनल मैच का पूरा घटनाक्रम विस्तार से रखा गया है। जिस अध्याय में फाइनल की सुबह का माहौल बताया गया है, टॉस से लेकर पहले दस ओवर तक की रणनीति तक, वह हिस्सा मुझे सबसे ज्यादा बांधे रखने वाला लगा, क्योंकि वहां लेखक सिर्फ स्कोर नहीं बताते, बल्कि यह भी बताते हैं कि मैदान पर हर फैसला किस सोच से लिया गया। किताब के आखिरी हिस्से में आंकड़े भी दिए गए हैं, जैसे टॉप रन स्कोरर और टॉप विकेट टेकर की पूरी तालिका, जो पढ़ने में दिलचस्प तो है लेकिन ईमानदारी से कहूं तो कहानी के बहाव को थोड़ा तोड़ती भी है।

मुझे किताब में सबसे ज्यादा क्या पसंद आया

सबसे पहली बात जो मुझे पसंद आई, वह दीप्ति शर्मा का हिस्सा है। किताब में बताया गया है कि 2017 विश्व कप के बाद दीप्ति को कई मौकों पर चोट से जूझना पड़ा, और उन्होंने अपनी मानसिकता को दोबारा तैयार करने में लंबा वक्त लगाया। जब लेखक यह बताते हैं कि उन्होंने डब्ल्यूबीबीएल में 171 रन नाबाद की पारी खेली और भारत की पहली महिला क्रिकेटर बनीं जिन्हें वहां बेस्ट बॉलर का सम्मान मिला, तो यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं लगता, यह एक पूरी लड़ाई की कहानी लगती है। इसी तरह रिचा घोष, रेणुका सिंह ठाकुर, पूजा वस्त्राकर और राजेश्वरी गायकवाड़ पर लिखे अलग अलग अध्याय भी मुझे अच्छे लगे, क्योंकि हर एक की भूमिका को अलग तरह से समझाया गया है, कोई फिनिशर है, कोई नई गेंद से शुरुआती दबाव बनाने वाली है, कोई ऑलराउंडर है जो मध्य ओवरों में संतुलन देती है, कोई स्पिन से किफायती गेंदबाजी करके दूसरे छोर पर विकेट लेने का मौका बनाती है। यह दिखाता है कि लेखक ने सिर्फ हरमनप्रीत या स्मृति जैसे बड़े नामों पर निर्भर रहकर किताब नहीं लिखी है, बल्कि टीम के हर हिस्से को लगभग बराबर जगह दी है।

भारतीय बेटियां जुनून और गर्व
भारतीय बेटियां जुनून और गर्व

एक और चीज़ जो मुझे पसंद आई, वह टीम की रणनीति वाला हिस्सा है, जहां डर से आजादी की बात की गई है। लेखक बताते हैं कि टीम मैनेजमेंट ने खिलाड़ियों को यह भरोसा दिलाया कि हारने का डर ही उनकी सबसे बड़ी रुकावट है, और जब तक यह डर पूरी तरह नहीं जाएगा, टीम अपना असली खेल मैदान पर नहीं दिखा पाएगी। इसी सोच को आगे ले जाते हुए एक और अध्याय में आक्रामकता और स्थिरता के बीच के तालमेल की बात की गई है, जहां हरमनप्रीत की कप्तानी को एक स्थिर और भरोसेमंद नेतृत्व के तौर पर दिखाया गया है। मुझे यहां एक छोटी सी बात खटकी भी, टीम की रणनीति पर आधारित दो अलग अध्यायों का शीर्षक लगभग एक जैसा रखा गया है, जिससे पढ़ते वक्त कभी कभी यह याद रखना मुश्किल हो जाता है कि आप किताब में कहां तक पहुंचे हैं। यह कोई बड़ी खामी नहीं है, लेकिन एक अनुभवी संपादक के तौर पर मुझे लगा कि इसका जिक्र करना जरूरी है।

भावनात्मक हिस्सा

अगर मुझे किताब का सबसे भावुक हिस्सा चुनना हो, तो वह शुरुआती अध्यायों में आता है, जहां लेखक उस दौर की बात करते हैं जब लड़कियों के घर से बल्ला लेकर मैदान तक जाने के रास्ते में समाज और परिवार दोनों तरफ से सवाल उठते थे। किताब में यह भी लिखा गया है कि कैसे इन्हीं लड़कियों ने इतिहास को नए सिरे से गढ़ा, न सिर्फ मैदान पर अपने खेल से बल्कि उस पूरे नजरिए को बदलकर जिससे महिला क्रिकेट को देखा जाता था। ईमानदारी से कहूं तो यह हिस्सा पढ़ते हुए मुझे अपने आसपास की कई लड़कियों की याद आई, जिन्हें खेल या करियर चुनने से पहले अपने परिवार को समझाना पड़ा था। यह सिर्फ क्रिकेट की बात नहीं रह जाती, यह हर उस लड़की की बात बन जाती है जिसे अपने फैसले के लिए लड़ना पड़ा हो। किताब के आखिर में लेखक का एक व्यक्तिगत संदेश भी है, जिसमें वह लिखते हैं कि यह किताब आत्मविश्वास की गाथा है, हार को हराकर जीत बनाने की कहानी, और यह पंक्ति मुझे काफी देर तक सोचने पर मजबूर करती रही।

यह किताब किनके लिए है

अगर आप क्रिकेट देखते हैं, खासकर महिला क्रिकेट को फॉलो करते हैं, तो यह किताब आपके लिए है ही। लेकिन इसका दायरा उससे कहीं बड़ा है, यह उन लोगों के लिए भी है जो महिला सशक्तिकरण, संघर्ष और आत्मविश्वास की सच्ची कहानियां पढ़ना पसंद करते हैं। जो मां बाप अपनी बेटियों को खेल की तरफ भेजने में हिचकिचाते हैं, उनके लिए भी यह किताब आंखें खोलने वाली साबित हो सकती है। हां, अगर आप सिर्फ हल्की फुल्की या तेज रफ्तार से चलने वाली कहानी चाहते हैं, तो बीच का आंकड़ों वाला हिस्सा आपको थोड़ा धीमा लग सकता है, यह मानना जरूरी है। स्कूल या कॉलेज जाने वाली लड़कियों के माता पिता को भी मैं यह किताब पढ़ने का सुझाव दूंगी, क्योंकि इसमें बताई गई हर खिलाड़ी की कहानी असल में एक जैसी शुरुआत से निकलती है, एक छोटे शहर या कस्बे से, सीमित संसाधनों के साथ।

आखिरी बात

“भारतीय बेटियां जुनून और गर्व” पढ़कर मुझे लगा कि डॉ. वेद प्रकाश दुबे ने सिर्फ एक जीत का जश्न नहीं मनाया, बल्कि उस पूरी यात्रा को इज्जत दी है जो इस जीत तक ले गई। हां, बीच में आंकड़ों वाला हिस्सा थोड़ा भारी लग सकता है, और कुछ अध्यायों के शीर्षक आपस में मिलते जुलते हैं, लेकिन इससे किताब का मकसद कमजोर नहीं पड़ता। यह किताब भारतीय महिला क्रिकेट की 2025 की जीत को सिर्फ स्कोरकार्ड तक सीमित नहीं रखती, यह इसे इंसानी कहानी बनाती है, जहां हर खिलाड़ी की मेहनत, हर परिवार की चिंता और हर छोटी हार का हिसाब बराबर जगह पाता है। मैं इसे उन सबको सुझाऊंगी जो खेल, संघर्ष और गर्व की सच्ची कहानियां पसंद करते हैं। 2026 में जब महिला क्रिकेट का दायरा भारत में और तेजी से बढ़ रहा है, यह किताब उस बदलाव की जड़ों को समझने का एक ईमानदार तरीका है।