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⭐⭐⭐⭐ (4.1 out of 5)
जब पहली बार मेरे हाथ में “क्वांटम फिजिक्स: विज्ञान के जगत में अतीत से भविष्य तक” आई, तो सच कहूं तो थोड़ा हैरान हुई। डॉ. वेद प्रकाश दुबे की परिचय पंक्ति पढ़ी तो पता चला कि वे ज्योतिष भूषण और मेडिकल एस्ट्रोलॉजर भी हैं, और साथ ही वैज्ञानिक अध्येता और मोटिवेशनल लेखक भी। यह मेल अपने आप में कुछ कहता है, क्योंकि यह किताब भी बिल्कुल यही करने की कोशिश करती है, विज्ञान और अध्यात्म को एक ही मेज पर बिठाने की। दीफाइड पब्लिकेशन में एडिटर इन चीफ के तौर पर पंद्रह साल से ज्यादा समय से मैं हर तरह की किताबें पढ़ रही हूं, फिक्शन से लेकर घनी वैज्ञानिक किताबों तक, और मुझे यह कहना होगा कि इस तरह की क्रॉसओवर किताबें लिखना आसान काम नहीं है। या तो ये बहुत सतही रह जाती हैं या फिर बहुत उलझा हुआ जार्गन बन जाती हैं। यह किताब इन दोनों के बीच एक रास्ता निकालने की कोशिश करती है, और ज्यादातर जगह यह कोशिश ईमानदार लगती है।
किताब की शुरुआत ही “क्वांटम” शब्द के अलग अलग मतलब समझाने से होती है, और यहीं से लेखक की मंशा साफ हो जाती है। पहले अध्याय में वे तीन अलग नजरियों को अलग अलग करके रखते हैं, भौतिक अर्थ जहां दावा है कि दिमाग की सूक्ष्म संरचनाओं में असली क्वांटम गणनाएं होती हैं, गणितीय मॉडलिंग वाला अर्थ जो सिर्फ इंसानी फैसलों के पैटर्न समझाने के लिए गणित का इस्तेमाल करता है, और तीसरा वह विवाद जो कहता है कि दिमाग का माहौल क्वांटम प्रक्रियाओं के टिकने के लिए बहुत गर्म और गंदा है। मुझे यह ईमानदारी अच्छी लगी। बहुत सी किताबें इस तरह के भेद को छुपा जाती हैं ताकि पाठक को लगे कि सब कुछ पक्का साबित हो चुका है, लेकिन यहां लेखक साफ कहते हैं कि यह भौतिक क्वांटम दावों पर तीखी आलोचना भी है और अभी इंतजार है और अधिक ठोस प्रयोगों का।
किताब का ढांचा बहुत सोच समझकर बनाया गया लगता है। शुरुआती अध्यायों में क्वांटम भौतिकी के मूल विचार, फिर धीरे धीरे इन्हें दिमाग और चेतना से जोड़ने की कोशिश, और आखिर में इनके व्यावहारिक इस्तेमाल की तरफ बढ़ना। दूसरे अध्याय में सुपरपोजिशन, एंटैंगलमेंट और अनिश्चितता सिद्धांत को चेतना से जोड़ने की कोशिश की गई है, और यहां रोजर पेनरोज़ और स्टुअर्ट हैमरॉफ के ऑर्केस्ट्रेटेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन सिद्धांत का जिक्र आता है। तीसरे अध्याय में एक केस स्टडी है जो मुझे सच में दिलचस्प लगी, एक संगीतकार का जिसने दावा किया कि उसकी सबसे अच्छी धुनें अचानक दिमाग में आती हैं, और एमआरआई स्कैन में पता चला कि धुन बनने से पहले दिमाग के कई हिस्सों में एक साथ हलचल होती है, मानो पूरा नेटवर्क एक साथ काम कर रहा हो। इस तरह के छोटे उदाहरण किताब को सिर्फ थ्योरी की किताब नहीं रहने देते, बल्कि पढ़ने में एक कहानी का एहसास भी देते हैं।

जो चीज मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई, वह है चौथे अध्याय में दिया गया ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का जिक्र, जहां 2014 में शोधकर्ताओं को दिमाग के न्यूरॉन्स में क्वांटम कोहेरेंस जैसी गतिविधियों के संकेत मिले थे, जो पहले सिर्फ फोटॉन और इलेक्ट्रॉन में देखी जाती थीं। लेखक इसे बहुत सावधानी से पेश करते हैं, यह कहते हुए कि इसका मतलब यह हो सकता है कि हमारा दिमाग सूचना को ऐसे तरीकों से प्रोसेस करता है जो शास्त्रीय कंप्यूटर कभी नहीं कर सकते। “हो सकता है” वाला यह लहजा पूरी किताब में बार बार आता है, और मुझे लगता है यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। यह दावा नहीं करती, यह संभावना रखती है।
बारहवें अध्याय में स्मृति और कल्पना पर जो चर्चा है, वह भी ध्यान खींचती है। यहां पॉल मैकलिन नाम के एक न्यूरोसाइंटिस्ट का अनुभव बताया गया है, जिसमें कुछ मरीज जिनका हिप्पोकैम्पस क्षतिग्रस्त था, फिर भी पुराने अनुभवों को हैरान करने वाले तरीके से याद कर पाते थे, और उनके ईईजी पैटर्न में नींद के दौरान क्वांटम जैसे उतार चढ़ाव दिखे। इसी तरह चौदहवें अध्याय में डिप्रेशन, चिंता और पीटीएसडी को क्वांटम एंटैंगलमेंट के टूटने के नजरिए से देखने की कोशिश है, और यहां लेखक साफ लिखते हैं कि यह अभी मुख्यधारा की चिकित्सा का हिस्सा नहीं है, और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हमेशा किसी योग्य पेशेवर से ही सलाह लेनी चाहिए। यह चेतावनी देखकर राहत मिली, क्योंकि इस विषय पर लिखी बहुत सी किताबें यह सावधानी बरतना भूल जाती हैं।
अब ईमानदार बात करूं तो कुछ जगहों पर किताब अपने ही दावों में उलझती हुई लगी। तेईसवें अध्याय में ऊर्जा के प्रकार समझाते हुए जब बात रेकी, क्रैनियोसैक्रल थेरेपी और एक्यूपंक्चर तक पहुंचती है, तो वहां वैज्ञानिक भाषा थोड़ी ढीली हो जाती है, और कुछ पैराग्राफ ऐसे भी हैं जो लगभग शब्दशः दोहराए गए हैं, जैसे ऊर्जा के रूप वाला हिस्सा दो बार लगभग एक जैसा आता है। यह संपादन की एक छोटी सी कमी है जिसे अगले संस्करण में ठीक किया जा सकता है। इसके अलावा जो पाठक सख्त पाठ्यपुस्तक जैसी भौतिकी की उम्मीद लेकर आएंगे, उन्हें शायद यह किताब उतनी संतुष्ट न करे, क्योंकि यहां जोर व्याख्या और संभावना पर है, गणितीय सिद्धता पर नहीं।
फिर भी, जो पाठक विज्ञान और अध्यात्म के बीच के इस धुंधले इलाके में दिलचस्पी रखते हैं, उनके लिए यह किताब एक अच्छी शुरुआत है। चौबीसवें और आखिरी अध्याय में लेखक बहुत ईमानदारी से कहते हैं कि यह पुस्तक केवल अध्ययन का निष्कर्ष नहीं है, बल्कि यह उस भविष्य की तरफ ले जाती है जहां विज्ञान भी अध्यात्म भी निर्धारित करता है। मुझे यह पंक्ति पूरी किताब का सार लगी। यह कोई अंतिम सच्चाई देने का दावा नहीं करती, बल्कि सवाल उठाने और सोचने के नए तरीके देने की कोशिश करती है।
अगर आप ऐसे पाठक हैं जो हर बात को सिर्फ प्रयोगशाला में साबित हुआ ही पढ़ना चाहते हैं, तो शायद यह किताब आपके लिए नहीं है। लेकिन अगर आप डॉ. वेद प्रकाश दुबे के साथ इस सफर पर निकलने को तैयार हैं, जहां क्वांटम भौतिकी, दिमाग और चेतना एक दूसरे से बातचीत करते हैं, तो यह किताब आपको काफी कुछ सोचने पर मजबूर करेगी। मेडिटेशन करने वालों, न्यूरोसाइंस में दिलचस्पी रखने वालों, और विज्ञान व अध्यात्म के बीच पुल तलाशने वालों के लिए यह एक सार्थक पढ़ाई है।
2026 में जब मानसिक स्वास्थ्य और दिमाग की क्षमताओं पर बातचीत हर तरफ हो रही है, यह किताब उस बातचीत में एक अलग कोण से शामिल होती है। क्या क्वांटम फिजिक्स बुक पढ़ने लायक है, यह सवाल हर पाठक खुद से पूछेगा, और मेरा जवाब है कि अगर आप खुले दिमाग से पढ़ें और इसे अंतिम सच्चाई नहीं बल्कि एक संभावना के तौर पर लें, तो हां, यह वक्त बर्बाद नहीं करेगी।

With over 11 years of experience in the publishing industry, Priya Srivastava has become a trusted guide for hundreds of authors navigating the challenging path from manuscript to marketplace. As Editor-in-Chief of Deified Publications, she combines the precision of a publishing professional with the empathy of a mentor who truly understands the fears, hopes, and dreams of both first-time and seasoned writers.